अप्रैल 2018 में भारतीय बैडमिंटन टीम ने पहली बार कॉमन वेल्थ चैम्पियनशिप में पहली बार मिश्रित टीम स्पर्धा में गोल्ड जीता था. वहीँ महिला एकल स्पर्धा के फाइनल में भारत के ही सिंधु एवं साइना नेहवाल के मध्य हुआ था. इससे कुछ माह पूर्व 2017 के वर्ल्ड चैंपियनशिप में भारत को सिंधु और साइना ने रजत एवं कांस्य पदक दिलाया था. उसी वर्ष किदाम्बी श्रीकांत नविन रैंकिंग सिस्टम के वर्ल्ड रैंकिंग में नंबर एक बनने वाले भारत के पहले पुरुष खिलाड़ी बनने का सौभाग्य प्राप्त किया. एक समय ऐसा भी हुआ की भारत के 5 खिलाड़ी पुरुषों के शिर्ष 20 रैंकिंग में अपना स्थान बनाया.
उसके बाद से अभी तक भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी अपना सर्वोच्च प्रदर्शन नहीं कर पाये हैं बल्कि प्रदर्शन में गिरावट हुई है ये कहना गलत नहीं होगा. पिछले वर्ल्ड चैंपियनशिप में मिले सिंधु और साई प्रणीत की सफलता को अपवाद में लिया जाये तो भारतीय खिलाडियों का प्रदर्शन निराशाजनक रहा है.
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| सिंधु अपने BWF वर्ल्ड चैंपियनशिप - 2019 गोल्ड मेडल और ट्रॉफी के साथ |
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| साई प्रणीत क्वार्टरफाइनल मैच जितने के बाद |
हाल के टूर्नामेंट्स में भारतीय खिलाडियों का प्रदर्शन खासकर इंडोनेशिया मास्टर्स में सभी खिलाडियों का दूसरे राउंड तक बहार हो जाना इस बात का अंदेशा है कि भारतीय बैडमिंटन एसोसिएशन को इस ओर ध्यान देना होगा अन्यथा कुछ माह बाद टोक्यो में होने वाले ओलिंपिक के बैडमिंटन स्पर्धा में खली हाथ आना पड़ेगा. हाल की रैंकिंग के अनुसार महिला एकल में पी. वी. सिंधु , पुरुष एकल में बी. साई प्रणीत और पुरुष युगल में सात्विक साईराज रन्किरेड्डी एवं चिराग शेट्टी की जोड़ी क्वालीफाई करते नजर आ रही है. भारतीय बैडमिंटन में अगर नजदीक से झाँका जाये तो कुछ चुनौतियां ऐसी है जो इसके उत्थान में बाधा उत्पन्न कर रही है.
अच्छी कोचिंग की कमी
भारत जैसे बड़े देश में प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है लेकिन विश्वस्तरीय व्यवस्था और अच्छे कोच बहुत कम है. हम कब तक अच्छी ट्रेनिंग के लिए गोपीचंद अकादमी, प्रकाश पादुकोण अकादमी और वर्तमान में कुछ बेहतर प्रदर्शन करने वाली असम बैडमिंटन अकादमी पर निर्भर रहेंगे. अगर भविष्य में बेहतर प्रदर्शन चाहिए तो देश के कोने-कोने में ऐसी और भी अकादमी और कोच की जरुरत होगी. इसके अलावा कोचों के स्पेशल ट्रेनिंग प्रोग्राम शुरू करना होगा. इनके अलावा मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार पुलेला गोपीचंद और प्रकाश पादुकोण के बीच मतभेद भी खेल पर बुरा असर कर रही है.
विदेशी कोचों का वापस जाना
मुख्या बैडमिंटन कोच गोपीचंद पर अत्यधिक भार आ जाने के कारण भारतीय बैडमिंटन एसोसिएशन ने अपने शीर्ष खिलाडियों के ट्रेनिंग के लिए विदेशी कोचों को कॉन्ट्रैक्ट पर भारत में आमंत्रित किया जिसका तत्काल प्रभाव हमे देखने को भी मिला.
इन्डोनेशियाई कोच मूल्यो हंड्योके मार्गदर्शन में श्रीकांत BWF के रैंकिंग में प्रथम स्थान हासिल किया. सिंधु कोरियन कोच किम जी ह्यून के मार्गदर्शन में भारत को पहला वर्ल्ड चैंपियनशिप का ख़िताब दिलाया परन्तु दोनों कोच अपना कार्यकाल पूर्ण करने से पहले निजी करने का हवाला देकर दूसरे देश में पदभार ग्रहण कर लिया इन दोनों के जाने के बाद से ही सिंधु और श्रीकांत के प्रदर्शन में गिरावट आई है. इसी तरह की परिस्थिति का भारत के डबल्स कोच फ्लान्डी लिमपेले ने कुछ खिलाडियों के ख़राब बर्ताव का हवाला देकर अंदेशा दिया है जो बताता है की खिलाडियों और कोचों में सब कुछ अच्छा नहीं चल रहा है.
जूनियर खिलाडियों के लिए कोई सुव्यवस्थित प्रोग्राम का न होना.
पी. वी. सिंधु ने वर्ष 2012 में एशियाई जूनियर चैंपियनशिप का ख़िताब जीता था. उसके बाद से किसी भी भारतीय भारतीय महिला एकल बैडमिंटन खिलाड़ी ने एशियाई चैम्पियनशिप या वर्ल्ड जूनियर चैंपियनशिप में मैडल नहीं जीता है.
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| लक्ष्य सेन |
पुरुष एकल में भी लक्ष्य सेन ने ही सिर्फ भविष्य में टॉप १० में आने की संभावनाओं को बल दिया है. सात्विक और चिराग की जोड़ी को अगर छोर दिया जाये तो शायद ही कोई युगल जोड़ी ने अपने प्रतिभा का प्रदर्शन किया हो. अगर आप अभी के शीर्ष बैडमिंटन खिलाडियों पर नजर डालेंगे तो आप पाएंगे की उन सभी का जूनियर स्टार पर शानदार करियर रहा है. भारत जैसे बड़े देश की तुलना में असाधारण प्रतिभावान खिलाड़ीयों की बेहद कमी है जिसका फिर से वही टॉप क्लास कोच और सपोर्ट स्टाफ है.
फण्ड का विषमता से वितरण होना
पिछले दशक में चाहे गवर्नमेंट हो, एसोसिएशन हो या निजी कार्यक्षेत्र, सभी ने भारतीय बैडमिंटन में दिल खोल कर निवेश किया जिसके कारण इस खेल में बेहतरीन उत्थान हुआ. लेकिन सवाल ये है कि बैडमिंटन के जो बड़े सितारे हैं जिनके नाम दुनिया के सबसे ज्यादा धन प्राप्त करने वाले खिलाड़ीयों में शुमार है और जिनको बहुत सरे स्पॉंशरशिप प्राप्त है क्या उनको सही में भारत सरकार की TOPS स्कीम की आवस्यकता है. क्या ये धन को अन्य उभरती हुयी प्रतिभाओं पर नहीं निवेश किया जा सकता है. बैडमिंटन एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया को अपने से कम लोकप्रिय नेशनल राइफल एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया के क्रांतिकारी जूनियर प्रोग्राम से सिख लेनी चाहिए जिन्होंने अपनी युवाओं को प्राथमिकता दी.
फिटनेस एक चिंतन करने वाली मुद्दा
बैडमिंटन के वर्तमान प्रारूप में फिजिकल फिटनेस का बहुत ज्यादा महत्व है, इसलिए पूर्व में जो स्ट्रेटजीस काम करते थे जरुरी नहीं की वो आज भी काम करे. अगर हम हाल के परिणामों की तरफ ध्यान से देखें तो पता चलेगा की भारतीय शटलर्स वर्तमान खेल में बदलते प्रवृति के साथ तालमेल नहीं मिला पा रहे है. ऐसे बहुत से मैच आप पाएंगे की तीसरे सेट में मैच खींचने के बाद भारतीय खिलाड़ीयों को हार का सामना करना पड़ा जो इस ओर इंगित करता है की उनमे फिटनेस की कमी है. जरुरत इस ओर है की उनकी खान-पान और फिटनेस ट्रेनिंग देखा जाये और उनको बेहतर किया जाये.
मेन्टल कंडीशनिंग
बैडमिंटन को फिजिकल चेस भी कहा जाता है क्यूंकि इसमें फिटनेस के साथ मानशिक स्वस्थ का परीक्छण भी होता है. भारत जैसे देश में बहुत कम खिलाड़ी अपने खेल के विशिष्ट वर्ग में पहुंच पाते हैं इसलिए उनपर मेडल और टूर्नामेंट जितने का मानसिक दबाव बहुत ज्यादा होता है. इस दबाव भरे माहौल में अपना सर्वोत्तम प्रदर्शन कर पाना आसान नहीं होता है. कुछ भारतीय शटलरों ने अपने उदासीनता और प्रेरणहीनता की निशानी कोर्ट पर अपने हाव भाव से दर्शायी है. एक स्पोर्ट्स साइकोलॉजिस्ट एक कोच से बेहतर इस तरह के मामलों को ध्यान दे सकता है. भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ीयों को ऐसे स्पोर्ट्स साइकोलॉजिस्ट की सेवा लेना चाहिए.
चिकित्सा की पढ़ाई में बीमारी की परिधीय अवधि में रोगी गैर-सम्बंधित संकेत और लक्षण पूर्ण विकसित लाक्षणिक अवस्था की शुरुआत में दर्शाता है. अगर खेल की पतन को रोग से तुलना की जा सकती है तो भारतीय बैडमिंटन अपनी पतन की अवस्था में अभी प्रवेश कर चूका है. अब बैडमिंटन एसोसिएशन और खेल मंत्रालय पर निर्भर करता है की वे समय रहते समाधान प्रदान करते है और पतन को तेज होने से रोकते हैं की नहीं
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